ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस/GPS) क्या है ?

Global Positioning System (GPS)

ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस/GPS)

ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस/GPS) अन्तरिक्ष आधारित एक उपग्रह नेविगेशन प्रणाली है, जिसके माध्यम से पृथ्वी पर किसी भी स्थान की भौगोलिक स्थिति की सटीक जानकारी प्राप्त हो सकती है। यह प्रणाली दुनियाभर में सैन्य, नागरिक और व्यावसायिक उपयोगकर्ताओं के लिए काफी महत्वपूर्ण है। जीपीएस प्रणाली संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा संचालित तथा अनुरक्षित है, परन्तु जीपीएस रिसीवर के माध्यम से इस प्रणाली का उपयोग विश्व में कहीं भी किया जा सकता है।

उदभव एवं विकास

जीपीएस (GPS) परियोजना की शुरुआत मूल रूप से अमेरिकी रक्षा विभाग के द्वारा वर्ष 1973 में हुई थी। जीपीएस प्रणाली के विकास के पूर्व भी अनेक नेविगेशन प्रणालियाँ प्रचलन में थीं, परन्तु उनमें अनेक तरह की खामियाँ थीं। ब्रैडफोर्ड पार्किंसन्स, रोजर एल. ईस्टन तथा ईवान ए. महोदय को जीपीएस प्रणाली की खोज का श्रेय जाता है। जीपीएस का डिजाइन आंशिक रूप से वर्ष 1940 के दशक में विकसित तथा द्वितीय विश्व युद्ध में प्रयुक्त रेडियो नेविगेशन (जैसे- लोरान तथा डेका नेविगेटर) पर आधारित है।

संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा प्रयुक्त प्रथम उपग्रह नेविगेशन प्रणाली ट्रांजिट का वर्ष 1960 में पहली बार सफलतापूर्वक परीक्षण किया गया। इसमें नेविगेशन के लिए पाँच उपग्रहों की मदद ली गई थी। यह जीपीएस के विकास में एक क्रान्तिकारी कदम था। 1967 में अमेरिकी नौसेना द्वारा टाइमेशन उपग्रह छोड़ा गया, जिसके माध्यम से अन्तरिक्ष में सटीक घड़ियों को स्थापित किया गया।

इस तकनीक के प्रयोग से जीपीएस (GPS) के विकास में तेजी आई। 1970 के दशक में भूमि आधारित ओमेगा नेविगेशन प्रणाली की शुरुआत हुई, जो पहली विश्वव्यापी रेडियो नेविगेशन प्रणाली थी। यद्यपि द्वितीय विश्व युद्ध के समय से ही नेविगेशन प्रणालियों की आवश्यकता हो रही थी और इसका विकास भी हो रहा था, परन्तु शीत युद्ध के समय में वैश्विक एवं सटीक नेविगेशन प्रणाली की अत्यधिक आवश्यकता महसूस हुई। हथियारों के दौड़ में नित नए अत्याधुनिक हथियारों का विकास हो रहा था।

सबमरीन-लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल, अन्तरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल आदि के लिए और अधिक स्टीक एवं विश्वसनीय नेविगेशन प्रणाली की आवश्यकता हुई। अमेरिकी नौसेना, वायु सेना तथा थल सेना ने अलग-अलग रूप से जीपीएस के विकास में अपना योगदान दिया। अमेरिकी वायु सेना का मोजैक, प्रोजेक्ट -57, तथा प्रोजेक्ट-621बी एवं अमेरिकी थल सेना का सेक्टर सीक्वेन्शियल कोलेशन ऑफ रेन्ज उपग्रह कुछ ऐसी ही पहल थी।

वर्ष 1973 में संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा डिफेन्स नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम नाम का एक कार्यक्रम चलाया गया, जिसका नाम बाद में बदलकर नेविगेशन सिस्टम यूजिंग टाइमिंग एण्ड रेन्जिंग (नेवस्टार) जीपीएस (GPS) रखा गया। यही बाद में ‘जीपीएस’ कहलाया। प्रारम्भ में जीपीएस का प्रयोग सिर्फ सैन्य कार्यों के लिए होता था, परन्तु अमेरिका में राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के कार्यकाल में इसे असैनिक गतिविधियों के लिए भी खोल दिया गया।

कालान्तर में जीपीएस को और अधिक आधुनिक बनाया गया। आधुनिकीकरण की यह प्रक्रिया अभी भी जारी है। बढ़ती हुई सैन्य, नागरिक तथा व्यावसायिक जरूरतों के अनुसार जीपीएस में भी सुधार किए जा रहे हैं। अब तो रूस, यूरोपीय संघ, चीन, भारत तथा जापान की भी अपने-अपने उपग्रह आधारित नेविगेशन प्रणाली हैं।

जीपीएस (GPS) की मूल अवधारणा एवं उसकी संरचना

जीपीएस (GPS) के तीन मुख्य भाग होते हैं –

1. अन्तरिक्ष खण्ड (एसएस)

2. नियन्त्रण खण्ड (सीएस)

3. उपयोगकर्ता खण्ड (यूएस)।

अन्तरिक्ष खण्ड (एसएस)-

अन्तरिक्ष खण्ड यह खण्ड 24 से 32 जीपीएस उपग्रहों का समूह है, जो पृथ्वी से लगभग 20200 किमी ऊपर वृत्तीय कक्ष में पृथ्वी का चक्कर लगाते रहते हैं। अलग-अलग कक्षों में ये उपग्रह इस प्रकार पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं कि कम-से-कम चार से छह उपग्रह हमेशा पृथ्वी के किसी एक बिन्दु पर केन्द्रित रहते हैं। प्रत्येक उपग्रह दिन में दो बार पृथ्वी का चक्कर लगाता है। इससे जीपीएस तकनीक में शुद्धता तथा विश्वसनीयता आती है और किसी स्थान की भौगोलिक स्थिति तथा स्थानीय समय की सटीक जानकारी मिलती है।

नियन्त्रण खण्ड (सीएस)-

नियन्त्रण खण्ड इसमें एक मास्टर नियन्त्रण स्टेशन (एमसीएस), एक वैकल्पिक मास्टर नियन्त्रण स्टेशन, चार समर्पित जमीनी एण्टीने (डेडिकेटेड ग्राउण्ड एण्टीना) तथा छह डेडीकेटेड निगरानी स्टेशन होते हैं। मास्टर नियन्त्रण स्टेशन डेडिकेटेड ग्राउण्ड एण्टीने की मदद से जीपीएस उपग्रहों की कक्षीय गति को नियन्त्रित करता है तथा उसको अन्य दूसरे जीपीएस उपग्रहों से समक्रमित (सिन्क्रोनाइज) भी करता है। इससे उन उपग्रहों की आपसी तारतम्यता बनी रहती है और परिचालन सम्बन्धी खतरों में भी कमी होती है।

वैकल्पिक मास्टर नियन्त्रण स्टेशन, मास्टर नियन्त्रण स्टेशन में तकनीकी खामियों के समय में उपग्रहों पर नियन्त्रण का काम करता है। वास्तव में नियन्त्रण खण्ड पूरी जीपीएस प्रणाली के मस्तिष्क की तरह काम करता है तथा उपग्रह की गति, उसकी आपसी समक्रमितता एवं उसके द्वारा भेजी गई विभिन्न सूचनाओं पर भी नियन्त्रण करता है।

ऑपरेशन कण्ट्रोल सेग्मेण्ट ओसीएस वर्तमान में रिकॉर्डो के नियन्त्रक खण्ड के रूप में काम करता है। यह नियन्त्रण खण्ड का एक महत्वपूर्ण भाग है। जीपीएस ओसीएक्स (नेक्सट जेनरेशन जीपीएस ऑपरेशन कण्ट्रोल सेगमेण्ट) आधुनिक जीपीएस प्रणाली को बढ़ती एवं बदलती जरूरतों के हिसाब से ढालने में सक्षम है। यह मौजूदा ओसीएस कार्यक्रम का उन्नत रूप है। इसके माध्यम से अधिक सुरक्षित, सटीक एवं विश्वसनीय सूचनाएँ दी जा सकती हैं। इसके द्वारा साइबर आक्रमणों से सुरक्षा की जा सकती है।

उपयोगकर्ता खण्ड (यूएस)-

इसके अन्तर्गत सैन्य, नागरिक एवं व्यावसायिक उपयोगकर्ता आते हैं, जो जीपीएस रिसीवर के माध्यम से जीपीएस उपग्रहों द्वारा भेजे गए, स्थान एवं समय सम्बन्धित सूचनाओं का उपयोग करते हैं। आम तौर पर जीपीएस रिसीवर में एक एण्टीना, रिसीवर प्रोसेसर और एक क्रिस्टल दोलक घड़ी होती है। एण्टीने को इस प्रकार से व्यवस्थित किया जाता है, जिससे वह जीपीएस उपग्रहों से प्रेषित सूचनाओं को प्राप्त कर सके।

इन उपकरणों के अलावा जीपीएस रिसीवर में प्रयोगकर्ता को स्थान एवं समय सम्बन्धी सूचनाएँ प्रदान करने के लिए एक ‘डिस्प्ले’ भी होता है। जीपीएस उपग्रहों द्वारा प्रेषित नेविगेशन संकेतों में अनेक सूचनाएँ छुपी रहती हैं; जैसे- उपग्रह की स्थिति, आन्तरिक घड़ी की स्थिति, नेटवर्क की स्थिति आदि।

इन संकेतों को दो अलग-अलग वाहक आवृत्तियों पर प्रेषित किया जाता है। इनमें से एक का प्रयोग पूरे विश्व में किया जाता है तथा दूसरे का प्रयोग अमेरिकी सैन्य विभाग द्वारा किया जाता है। इन प्रेषित संकेतों का कूटानुवाद जीपीएस रिसीवर के माध्यम से ही किया जाता है।

अन्य उपग्रह आधारित नेविगेशन प्रणालियाँ

  • ग्लोनास (रूस)
  • बैदोउ (चीन)
  • कम्पास (चीन)
  • क्यूजेडएसएस (जापान)
  • गैलीलियो (यूरोपियन यूनियन)

जीपीएस (GPS) के अनुप्रयोग

यद्यपि जीपीएस मूल रूप से एक सैन्य परियोजना के रूप में विकसित किया गया था तथापि अब इसके अनेक असैन्य प्रयोग भी होने लगे हैं। वाणिज्य, विज्ञान, ट्रैकिंग एवं निगरानी के लिए भी जीपीएस का व्यापक रूप से प्रयोग होता है। समय एवं स्थान सम्बन्धी सटीक सूचना देने के अपने गुण के कारण इसका उपयोग बैकिंग, मोबाइल फोन, यहाँ तक कि बिजली ग्रिड के नियन्त्रण में भी होने लगा है। हाल ही में वैज्ञानिकों ने जीपीएस गोली के आविष्कार का दावा किया है, जिसके माध्यम से अपराधियों की गाड़ियों की निगरानी एवं ट्रैकिंग में आसानी होगी।

जीपीएस (GPS) के अनुप्रयोगों को निम्न दो भागों में बाँटा जा सकता है –

नागरिक प्रयोग

इसमें जीपीएस (GPS) के तीन बुनियादी घटकों- निरपेक्ष स्थिति, सापेक्ष गति एवं समय स्थानान्तरण का प्रयोग किया जाता है। खगोल विज्ञान के क्षेत्र में सौरमण्डल के बाहर के ग्रहों को खोजने, क्लॉक सिन्क्रोनाइजेशन, खगोलीय यान्त्रिकी गणना, विशेष प्रकार के दूरदर्शी आदि के निर्माण में ग्लोबल पोजिशनिंग प्रणाली का प्रयोग होता है। स्वचालित वाहनों के निर्माण, मानचित्र का निर्माण, सेलुलर टेलीफोनी आदि में जीपीएस का व्यापक प्रयोग हो रहा है। जीपीएस आधारित घड़ियाँ काफी सटीक समय बतलाती हैं।

आपदा के समय में जीपीएस (GPS) की मदद से आपातकालीन मदद एवं सुविधाएँ काफी जल्दी और सही स्थान पर पहुँच सकती हैं। फ्लीट ट्रैकिंग, जियोफेन्सिंग, वायुयान ट्रैकिंग में भी जीपीएस प्रणाली की मदद की जाती है। जियोट्रैगिंग के माध्यम से जीपीएस का उपयोग कर किसी फोटो अथवा अन्य दस्तावेजों के साथ स्थान निर्देशांक भी जोड़े जा सकते हैं।

आरटीके जीपीएस खनन में काफी उपयोगी है। इसके माध्यम से अयस्कों की स्थिति की सटीक जानकारी मिल सकती है जिससे खुदाई में समय पैसे की बचत होती है। सर्वेक्षण, टेलिमैटिक्स रोबोटिक्स, मनोरंजन के अनेक साधनों में तो आजकल जीपीएस के बिना काम ही नहीं चल सकता है। चिकित्सा, नगरीय विकास, कृषि संसाधनों का सर्वेक्षण आदि अनेक विकासात्मक कार्यों में जीपीएस का व्यापक पैमाने पर प्रयोग हो रहा है।

सैन्य प्रयोग

अनेक प्रकार के सैन्य उपकरणों में भी जीपीएस तकनीक का प्रयोग किया जाता है। क्रूज मिसाइल एवं अन्य नियन्त्रित प्रक्षेपास्त्रों में जीपीएस प्रणाली का ही प्रयोग किया जाता है, जिसके कारण ये शस्त्र सटीक निशाना लगाने में सक्षम होते हैं। शत्रु बेड़ों की जानकारी जीपीएस के माध्यम से प्राप्त हो सकती है। जीपीएस के द्वारा उच्चावच की जानकारी प्राप्त होती है, जो रक्षा, बचाव एवं आक्रमण के लिए अत्यधिक आवश्यक है।

जीपीएस (GPS) के दुरूपयोग

जीपीएस आतंकवाद

जीपीएस का दुरूपयोग भी सम्भव है। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के कुछ वैज्ञानिकों ने यह साबित किया कि जीपीएस आधारित यातायात के साधनों को हैक किया जा सकता है तथा उनके परिचालन को न सिर्फ ठप्प किया जा सकता है, बल्कि 26/11 तथा 9/11 जैसी आतंकवादी घटनाओं को भी अन्जाम दिया जा सकता है। परन्तु जीपीएस का सावधानीपूर्वक प्रयोग एवं अनुसंधान से जीपीएस को ज्यादा सुरक्षित बनाया जा सकता है।

जीपीएस (GPS) तकनीक में भारत की स्थिति

बढ़ती हुई नागरिक एवं सैन्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भारत को भी जीपीएस तकनीक की आवश्यकता हुई। सूचना एवं प्रौद्योगिकी क्रान्ति के साथ भारत में मोबाइल क्रान्ति का भी श्रीगणेश हुआ। मोबाइल फोन में लगे जीपीएस रिसीवर एवं अन्य उपकरणों में लगे जीपीएस रिसीवर की मदद से भारत में लाखों लोग जीपीएस तकनीक का फायदा उठा रहे हैं। भारत में जीपीएस तकनीक की वास्तविक शुरुआत जीपीएस एडेड जियो ऑगमेण्टेड नैविगेशन (गगन) के प्रारम्भ के साथ माना जा सकता है।

जीपीएस एडेड जियो ऑगमेण्टेड नेविगेशन (गगन)-

यह भारत का उपग्रह आधारित यातायात संचालन तन्त्र है। इसकी शुरुआत 10 अगस्त, 2010 को हुई। इससे पहले सिर्फ अमेरिका, रूस तथा चीन में यह सुविधा उपलब्ध थी। गगन को एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इण्डिया और इसरो ने मिलकर ₹ 750 करोड़ की लागत से तैयार किया है। यह प्रणाली पृथ्वी की छह कक्षाओं मैं स्थापित किए गए 24 उपग्रहों के समूह से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर काम करती है। गगन के उपयोग से न केवल भारत को, बल्कि दक्षिण पूर्व एशिया से अफ्रीका के बीच भी हवाई यातायात को भी मदद मिलेगी। इसके साथ ही इससे जलयान, रेल, सड़क आदि अन्य यातायात के साधनों के संचालन तथा बचाव अभियानों, वायु सेना, सर्वेक्षण, मानचित्रण, कृषि आदि में भी सहायता मिलेगी। गगन की सहायता से विमान सीधी रेखा में उड़ान भर सकते जिससे ईंधन की भी बचत होती है। गगन, कोहरे एवं बारिश के मौसम में भी वायुयानों एवं यातायात के अन्य साधनों के परिचालन में मदद करता है।

गगन के लिए भारत अमेरिकी जीपीएस (GPS) प्रणाली पर ही निर्भर है। भारत ने ‘आईआरएनएसएस’ नाम से एक स्वदेशी नेविगेशन प्रणाली की शुरुआत की है, जो अभी अपने आरम्भिक चरण में ही है।

आईआरएनएसएस

भारतीय क्षेत्रीय नेविगेशन उपग्रह प्रणाली अथवा इण्डियन रीजनल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम, (आईआरएनएसएस) भारतीय अन्तरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा विकसित एक क्षेत्रीय उपग्रह नेविगेशन प्रणाली है। इसका उद्देश्य नक्शे तैयार करना, जियोडेटिक आँकड़े जुटाना, समय की सटीक जानकारी, चालकों को दृश्य एवं ध्वनि संकेतों के माध्यम से नेविगेशन की जानकारी, मोबाइल फोनों के साथ एकीकरण, आपदा प्रबन्धन, ट्रैकिंग एवं निगरानी करना है।

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