रामधारी सिंह ‘दिनकर’ का जीवन परिचय । Ramdhari Singh ‘Dinkar’ Biography

Ramdhari Singh 'Dinkar' Biography

रामधारी सिंह ‘दिनकर’ (Ramdhari Singh ‘Dinkar’) का जीवन परिचय

जन्म

श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’ (Ramdhari Singh ‘Dinkar’) का जन्म बिहार के मुंगेर जनपद के सिमरिया घाट नामक गाँव में 23 सितम्बर सन 1908 ई. (संवत 1965 वि.) में हुआ था। इनके पिता का नाम बाबू रवि सिंह एवं माता का नाम मनरूप देवी था।

शिक्षा एवं प्रारंभिक जीवन

पटना विश्वविद्यालय से बीए. (ऑनर्स) किया। आप एक वर्ष मोकामा घाट के विद्यालय में प्रधानाचार्य रहे। सन् 1935 ई. में सब – रजिस्ट्रार के रूप में सरकारी नौकरी में आए। सन् 1942 ई. में ब्रिटिश सरकार के युद्ध प्रचार विभाग में आए और उपनिदेशक के पद पर रहे। बाद में, मुजफ्फरपुर कॉलेज में हिन्दी विभागाध्यक्ष रहे।

आप सन् 1952 ई. से सन् 1963 ई. तक राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत राज्यसभा के सदस्य रहे। सन् 1964 ई. में भागलपुर विश्वविद्यालय के उपकुलपति पद पर आपकी नियुक्ति हुई।

साहित्य सेवा

‘दिनकर’ जी ने भारत सरकार की ‘हिन्दी समिति के सलाहकार और आकाशवाणी के निदेशक के पद पर रहकर हिन्दी के उत्थान के लिए महत्त्वपूर्ण कार्य किया।

‘दिनकर’ की रामनरेश त्रिपाठी की ‘पथिक’ और मैथिलीशरण गुप्त की ‘भारत – भारती’ रचनाओं का प्रभाव पड़ा। ‘दिनकर’ जी प्रारम्भ से ही लोक के प्रति निष्ठावान, सामाजिक उत्तरदायित्व के सजग और जनसाधारण के प्रति समर्पित कवि थे।

इनकी कविताओं में राष्ट्रीयता की छाप सबसे अधिक है। दिनकर ने काव्य और गद्य दोनों ही क्षेत्रों में सशक्त साहित्य का सृजन किया है। उनकी कविता हृदय को झकझोर डालती है।

दिनकर जी ने मुख्य रूप से वीर रस प्रधान कविताओं की रचना की है। परन्तु फिर भी कहीं-कहीं शान्त तथा शृंगार रस भी प्रयुक्त हुए हैं। दिनकर जी की भाषा शुद्ध खड़ी बोली है। वे अपनी भाषा में अधिकांश तत्सम शब्दों का प्रयोग करते हैं। इनकी भाषा व्याकरण सम्मत है और अलंकारपूर्ण है। उसमें खड़ी बोली का निखरा रूप मिलता है।

पुरस्कार एवं सम्मान

(1) भारत गण राज्य के महामहिम राष्ट्रपति ने उनकी प्रतिभा और साहित्य सेवा के लिए उन्हें ‘पद्म भूषण’ की उपाधि से अलंकृत किया।

(2) दिनकर जी को ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। इस पुरस्कार के लिए एक लाख रुपये दिए जाते है।

रचनाएँ

दिनकर जी की प्रमुख रचनाएँ निम्नलिखित हैं- (1) रेणुका, (2) हुँकार, (3) रसवन्ती, (4) द्वन्द्वगीत, (5) सामधेनी, (6) कुरुक्षेत्र, (7) रश्मिरथी, (8) उर्वशी, (9) परशुराम की प्रतिज्ञा

इनके अतिरिक्त– प्रण-भंग, बापू, इतिहास के आंसू, धूप और धुंआ, दिल्ली, नीम के पत्ते, नीलकुसुम, चक्रवात, ‘सीपी और शंख’, नए सुभाषित, ‘कोयला और कवित्व’, आत्मा की आँखें, ‘हारे को हरि नाम’, आदि रचनाएँ बहुत प्रसिद्ध हैं।

साहित्य में स्थान

दिनकर जी की प्रतिभा बहुमुखी है। वे अत्यन्त लोकप्रिय कवि हैं। भाव, भाषा तथा शैली में ओज, उनके भावों में क्रान्ति की ज्वाला और उनकी शैली में प्रवाह है। उनकी कविता में महर्षि दयानन्द की सी निडरता, भगत सिंह जैसा बलिदान, गाँधी की सी निष्ठा एवं कबीर की सी भावना एवं स्वच्छन्दता विद्यमान है। वे आधुनिक हिन्दी काव्य धारा के प्रतिनिधि कवि हैं।

मृत्यु

हिन्दी साहित्य का यशस्वी ‘दिनकर’ 24 अप्रैल सन् 1974 ई. (सं. 2031 वि) में सदैव के लिए अस्त हो गया।

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