नक्सलवाद (Naxalism) क्या है ?

नक्सलवाद (Naxalism)

आजकल नक्सलवाद (Naxalism) से हर कोई वाकिफ है। वर्तमान में भारत के कई राज्य नक्सलवाद (Naxalism) से प्रभावित है। आज हम नक्सलवाद विषय पर चर्चा प्रस्तुत करेंगे। वर्तमान में नक्सलवादियों ने अपने प्रभाव क्षेत्र का जबरदस्त विस्तार कर लिया है। केन्द्रीय सुरक्षा बल-सीआरपीएफ जैसे अर्द्धसैन्य संगठनों तथा राज्य पुलिस बलों से बराबरी की टक्कर लेने में नक्सवादियों ने स्वयं को सक्षम बना लिया है। वर्तमान में नक्सलवाद (Naxalism) से सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य छत्तीसगढ़ है। छत्तीसगढ़ में कई बड़े नक्सली हमलें हो चुके है और आये दिन कई हमले छत्तीसगढ़ राज्य में होते रहते है।

इस पोस्ट के अन्तर्गत पीएससी/यूपीएससी की मुख्य परीक्षा से संबंधित अति महत्त्वपूर्ण मुद्दों के विषय में चर्चा प्रस्तुत की गई है। इस पोस्ट के अंतर्गत यहाँ पर वही लेख मिलेंगे – जो महत्त्वपूर्ण है एवं तात्कालिक मुद्दों पर आधारित हैं। इन प्रश्नों के माध्यम से न केवल आप किसी चर्चित मुद्दे के संबंध में अपनी समझ को धारदार बना सकते हैं बल्कि परीक्षा के दृष्टिकोण से संबंधित विषय से भी रूबरू हो सकते हैं। किसी भी परीक्षा को क्रैक करने के लिए आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच जरूरी है। योजनाबद्ध तरीके से काम करके ही आप सफलता पा सकते है। यहाँ पीएससी/यूपीएससी की मुख्य परीक्षा की दृस्टि से महत्वपूर्ण मुद्दों पर ही चर्चा प्रस्तुत की जायेगी ताकि आपका समय भी बर्बाद न हो और आप बहुत अच्छी तैयारी कर सके।

नक्सलवाद क्या है ? । What is Naxalism ?

पं. बंगाल के एक अति पिछड़े तथा दूरदराज के गाँव नक्सलवाड़ी में 2 मार्च, 1967 को घटित एक घटना ने भारत में नक्सलवाद (Naxalism) को जन्म दिया। नक्सलवाड़ी गाँव के एक आदिवासी युवक बियल किसन ने अपनी भूमि को जोतने का अधिकार न्यायालय में प्राप्त कर लिया। जब उसने अपने खेत को जोतने का प्रयास किया तो स्थानीय भू-स्वामियों ने अपने गुंडों के साथ उस पर आक्रमण कर दिया। उस क्षेत्र के आदिवासियों में इस घटना की जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई और बदले की कार्यवाही करते हुए उन्होंने भूमि पर कब्जा करना प्रारम्भ कर दिया। इसके साथ ही इस आन्दोलन ने एक विद्रोह का रूप धारण कर लिया। उस समय पं. बंगाल में सत्तासीन साम्यवादी सरकार ने सभी सम्भव उत्पीड़नात्मक कार्यवाही करके 72 दिनों के भीतर नक्सलवाड़ी आन्दोलन को दबा दिया। इस घटना के बाद यह आंदोलन धीरे-धीरे अन्य राज्यों में फैल गया। वर्तमान में सशस्त्र नक्सलवादी समूह भारत सरकार तथा सम्बन्धित राज्य सरकारों के लिए एक भारी चुनौती बने हुए हैं।

भारतीय रेल, सरकारी बसें, सड़कें, पुल, सरकारी विद्यालय, सरकारी अस्पताल, पुलिस तथा अर्द्धसैन्य बलों के कैम्प और काफिले उनके निशाने पर हैं। वर्तमान में नक्सलवादियों ने अपने प्रभाव क्षेत्र का जबरदस्त विस्तार कर लिया है। नक्सलवादी आन्दोलन का सर्वाधिक काला पहलू यह है कि वे आदिवासी बहुल गाँवों में जाकर प्रत्येक परिवार से एक बच्चे/किशोर युवक/युवतियों को इन सशस्त्र संगठनों में भर्ती होने का आदेश सुनाते हैं। बच्चों एवं महिलाओं का प्रयोग सूचनावाहक के रूप में किया जाता है कभी-कभी इन्हे घातक हथियार लाने ले जाने के लिए भी प्रयुक्त किया जाता है।

नक्सलवादी समूह का नाम कुछ भी हो, उनकी रणनीति एक जैसी है। केन्द्रीय सुरक्षा बल-सीआरपीएफ जैसे अर्द्धसैन्य संगठनों तथा राज्य पुलिस बलों से बराबरी की टक्कर लेने में नक्सवादियों ने स्वयं को सक्षम बना लिया है। नक्सलवाद (Naxalism) से प्रभावित प्रत्येक राज्य में उनकी एक तकनीकी शाखा है जिसमें 8,000 रुपए से 15,000 रुपए तक के मासिक वेतन पर सूचना प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों, लैण्ड माइन्स विशेषज्ञों, नक्शानवीशो, विस्फोटकों का निर्माण करने वालों, सरकारी संदेशों को बीच में ही पकड़कर सरकार की रणनीति की जानकारी प्राप्त करके अपनी रणनीति बनाने वालों आदि को भर्ती किया जाता है। नक्सलियों ने 80 प्रतिशत एल्यूमिनियम नाइट्रेट तथा 20 प्रतिशत डीजल मिलाकर अत्यधिक घातक लैण्डमाइन्ड विकसित कर ली हैं। वे अत्याधुनिक लैपटॉपों, कम्प्यूटरों, जी.पी.आर.एस. आधारित मोबाइलों, सैटेलाइट फोनों से लैस हैं।

नक्सलवादियों (Naxalites) द्वारा धन की पूर्ति कैसे की जाती है ?

भारत में नक्सलवादी (Naxalite) जिस स्तर की लड़ाई राज्य के विरुद्ध लड़ रहे हैं, उसके लिए बहुत बड़ी मात्रा में धन की आवश्यकता पड़ती है। इसी के अनुरूप नक्सवादियों ने अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में सामानान्तर अर्थव्यवस्था सृजित कर ली है। बिहार में नेपाल की सीमा से लेकर झारखण्ड, प. बंगाल, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, आन्ध्रप्रदेश, कर्नाटक होते हुए केरल तक एक लाल गलियारा चिन्हित किया है जिसे वे स्वतंत्र नक्सलवादी क्षेत्र के रूप में निरूपित करते हैं। महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में सागौन और अन्य जंगली लकड़ी के कारोबार पर उनका नियंत्रण है तथा इसका एक बड़ा हिस्सा उनके पास जाता है। छत्तीसगढ़, झारखण्ड, आन्ध्रप्रदेश तथा पं. बंगाल के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में नक्सलियों की समानान्तर सरकार चलती है। जहाँ वे नागरिकों (आमतौर पर आदिवासियों) से सभी प्रकार के कर वसूलते हैं। उड़ीसा के अनेक हिस्सों में नक्सलियों के संरक्षण में गांजे की खेती की जाती है और उसकी बिक्री से प्राप्त अकूत धन नक्सलियों के पास जाता है।

नक्सल प्रभावित राज्यों में सड़कें, सरकारी भवनों एवं निर्माण से जुड़ी अन्य परियोजनाओं के ठेकेदारों से मनमाने तरीके से नक्सलियों द्वारा वसूली की जाती है। लेखपाल, ग्राम विकास अधिकारी, खण्ड विकास अधिकारी, तहसीलदार, आपूर्ति विभाग के अधिकारी आदि से भी वसूली की खबरें हैं। अब झारखण्ड, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, आन्ध्रप्रदेश, उड़ीसा आदि की खनिज सम्पदा पर भी नक्सलियों की दृष्टि है। सैद्धान्तिक रूप से वे आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में खानों की खुदाई का ठेका बहुराष्ट्रीय कम्पनियों (जैसे कि वेदान्त) या भारत की कम्पनियों को देने का प्रबल विरोध कर रहे हैं। उनका तर्क है कि इस प्रकार के खनन से मूलतः आदिवासी ही प्रतिकूल ढंग से प्रभावित हो रहे हैं। उनकी संस्कृति तथा जीविकोपार्जन के साधन ना हो रहे हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि अब नक्सलवादी स्वयं भी इसी अकूत सम्पदा से धनोपार्जन की योजना बना रहे हैं ।

नक्सल प्रायोजित हिंसा अब आतंकवाद का पर्याय बन चुकी है, जो आन्दोलन असहाय तथा शताब्दियों से शोषित और उत्पीडित आदिवासियों को उनके अधिकारों, उनके द्वारा जोती जा रही भूमि पर उनका स्वामित्वाधिकार, जिन वनों में वे रह रहे हैं उन वनों की वन सम्पदा पर उनका अधिकार, मानवाधिकार आदि को दिलाने के लिए प्रारम्भ किया गया था, वह अब सत्ता और शक्ति का साधन बन गया है लाल सेना पड़ोसी देशों से प्राप्त धन तथा हथियारों और गुरिल्ला युद्ध की तकनीक के सहारे बिहार से लेकर आन्ध्रप्रदेश तक अपनी शासन सत्ता स्थापित करना चाहती है और वह भी भारतीय संविधान के दायरे से बाहर एक स्वतंत्र देश के रूप में।

भारत में नक्सलवाद (Naxalism) की बड़ी घटनाएँ

हालिया दिनों में नक्सलवादियों ने ऊँची पहुँच वाले लोगों, नेताओं तथा पुलिसकर्मियों की हत्या करके अपनी शक्ति का परिचय कराया है। वे एक साथ बड़ी संख्या में कई जगहों पर पलिस तथा अर्द्धसैन्य बलों की टुकडियों पर हमला करते हैं। सरकारी प्रतिष्ठानों को नष्ट करके सरकारी सम्पत्ति तथा गोला बारुद को लूटते हैं। भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2005 से लेकर अब तक लगभग ग्यारह हजार लोग नक्सली हिंसा (Naxalism) के शिकार हो चुके हैं। इनमें पुलिस तथा अर्धसैन्य बलों के जवान, सामान्य नागरिक तथा नक्सली शामिल हैं।

➢ 2007 छत्तीसगढ़ के बस्तर में 300 से ज्यादा विद्रोहियों ने 55 पुलिसकर्मियों को मौत के घाट पर ‌उतार दिया था।

➢ 2008 ओडिसा के नयागढ़ में नक्सलवादियों ने 14 पुलिसकर्मियों और एक नागरिक की हत्या कर दी।

➢ 2009 महाराष्ट्र के गढ़चिरोली में हुए एक बड़े नक्सली हमले में 15 सीआरपीएफ जवान शहीद हो गये।

➢ 2010 नक्सलवादियों ने कोलकाता-मुंबई ट्रेन में 150 यात्रियों की हत्या कर दी।

➢ 2010 पश्चिम बंगाल के सिल्दा केंप में घुसकर नक्सलियों ने हमला कर दिया जिसमें अर्द्धसैनिक के 24 जवान शहीद हो गए।

➢ 2011 छत्तीसगढ के दंतेवाड़ा में हुए एक बड़े नक्सलवादी हमले में कुल 76 जवान शहीद हो गए जिसमें सीआरपीएफ के जवान समेत पुलिसकर्मी भी शामिल थे।

➢ 2012 झारखंड के गढ़वा जिले के पास बरिगंवा जंगल में 13 पुलिसकर्मीयों की हत्या कर दी।

➢ 2013 छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में नक्सलियों ने कांग्रेस के नेता समेत 27 व्यक्तियों की हत्या कर दी।

➢ 2021 में छत्तीसगढ़ के बीजापुर में सुरक्षा बलों के 23 जवान शहीद हो गए और 31 जवान घायल हुए।

नक्सलवाद (Naxalism) का उदय मूलत: शताब्दियों से शोषित आदिवासियों की मुक्ति और उद्धार हेतु जमींदारों, सूदखोरों, बड़े-बड़े किसानों के विरोध में हुआ था। वैचारिक रूप चीनी नेता माओत्से तुंग के विचारों से प्रेरणा लेकर कतिपय बुद्धिजीवियों ने निर्धन तथा हाशिए पर जा चुके आदिवासियों को संगठित किया, लेकिन धीरे-धीरे यह आन्दोलन हिंसा के बल पर राजनीतिक शक्ति तथा सत्ता हथियाने के लिए एक साधन के रूप में विकसित हो रहा है। अब नक्सलियों की लाल सेना में निर्धन आदिवासियों के युवक और युवतियाँ ही भर्ती नहीं हो रहे, बल्कि उच्च वर्ग के परिवारों के युवक और युवतियाँ भी इसमें शामिल हो रहे हैं। क्योंकि उन्हें अब नियमित रूप से वेतन मिलता है। शिक्षित-प्रशिक्षित होकर बेरोजगार रहने वाले युवाओं के लिए 10,000 रुपए से 20,000 रुपए तक के मासिक वेतन पर लाल सेना में भर्ती होना कोई बुरा विकल्प नहीं है। इसीलिए अब आदिवासियों एवं दलितों के अधिकारों के संरक्षण की लड़ाई लड़ने का उद्देश्य धीरे-धीरे गौण होता जा रहा है। नक्सलियों के शीर्ष नेताओं के रहन सहन तथा तौर-तरीकों में भी बदलाव आ रहा है, अब नक्सवादियों को निर्धनों, दलितों, आदिवासियों का मसीहा कहना बेमानी है। वास्तविक धरातल पर वे कमजोर तथा दबे-कुचले समुदायों के प्रति ही असहिष्णु हो गए हैं।

न्यूयॉर्क स्थित ह्यूमन राइट्स वॉच की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार नीची जातियों के हितों के संरक्षण की लड़ाई लड़ रहे नक्सलवादी संगठन अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में आम आदिवासियों पर अवैध कर लगाते हैं, ग्रामवासियों से भोजन तथा ठहरने के लिए स्थान की माँग करते हैं, अपने वर्ग के शत्रुओं का अपहरण करके उनकी हत्याएँ करते हैं, विकास के लिए आए सरकारी धन एवं सामान को छीनकर विकास प्रक्रिया में बाधा पहुँचाते हैं। नक्सलवादियों द्वारा विद्यालय भवनों को उड़ा देना, शिक्षकों एवं शिक्षिकाओं को पढ़ाने न देने के पीछे मंतव्य, कि वे नहीं चाहते कि शिक्षित होकर आदिवासी बाहरी दुनिया से जुड़े तथा अपनी उन्नति का मार्ग चुनें।

सड़के, पुल तथा संचार व्यवस्था नक्सलियों के निशाने पर रहती हैं। वे अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में पहले तो सड़कों और पुलों का निर्माण होने ही नहीं देते, यदि हो जाता है, तो उन्हें उड़ा देते हैं। यह सर्वविदित है कि सड़कें विकास की संवाहक हैं। पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तरप्रदेश आज यदि विकसित हैं तो इसका एक प्रमुख कारण इन प्रान्तों के प्रत्येक गाँव का पक्की सड़कों से जुड़ना नक्सलवादी आन्दोलन के प्रारम्भ होने, कालान्तर में उसके सशस्त्र संघर्ष में परिवर्तित होने तथा वर्तमान में उसका स्वरूप नितान्त आतंकवादी हो जाने के कारणों पर यदि विचार किया जाए तो अनलिखित कारण आज भी उतने ही महत्वपूर्ण दृष्टिगोचर होते हैं जितने कि इस आन्दोलन के प्रारम्भ होते समय साठ और सत्तर के दशक में थे।

नक्सलवाद (Naxalism) के प्रमुख कारण

➢ दलितों, आदिवासियों एवं कृषक समुदाय के हितों के संरक्षण हेतु पारित किए गए कानूनों का दोषपूर्ण कार्यान्वयन।

➢ निर्धनता, बेरोजगारी, अशिक्षा, कुपोषण और अज्ञानता के मकड़जाल में फँसे आदिवासी और दलित।

➢ प्रभावशाली बाहरी व्यक्तियों- भू-स्वामियों तथा सूदखोर महाजनों तथा व्यापारियों द्वारा आदिवासियों और दलितों का जमकर शोषण।

➢ वनों की बहुमूल्य लकड़ी तथा अन्य वन सम्पदा के कारोबार पर गैर आदिवासी कारोबारियों का नियंत्रण।

➢ अधिकांश आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में प्राथमिक विद्यालयों, अस्पतालों, औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों, पक्की सड़कों, शुद्ध पेयजल, विद्युत आपूर्ति आदि जैसी बुनियादी सुविधाओं का न होना।

इससे बड़ी विडम्बना की बात और क्या हो सकती है कि दलितों तथा कमजोर वर्गों (सर्वहारा वर्ग) के हितों का संरक्षण करने का दावा करने वाली प. बंगाल की वामपंथी सरकार ने अपने 25 वर्ष के शासनकाल में नक्सलवाद से सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्रों में विकास का कोई ऐसा कार्य नहीं किया, जिस पर गर्व किया जा सके। लगभग यही स्थिति नक्सलवाद (Naxalism) से प्रभावित अन्य राज्यों के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों की है।

आदिवासियों के पास जीवित रहने लायक भोजन, दवाएँ, शुद्ध पेयजल तक उपलब्ध नहीं है। निर्धन आदिवासियों के पास बीमारी से स्वयं तथा अपने बच्चों को बचाने लायक धन ही नहीं है। जिन आदिवासी बच्चों को विद्यालय में शिक्षारत होना चाहिए, वे बाल-श्रमिक के रूप में कार्य पर जाने लगते हैं। शिक्षित, अर्द्धशिक्षित तथा अशिक्षित अकुशल आदिवासी और दलित युवा रोजगार के अभाव में नक्सलवादियों के चुंगल में फँसकर आतंकवादी बन रहे हैं। आदिवासियों तथा निर्धनों के कल्याणार्थ चलाए गए कार्यक्रमों में आवंटित धन भ्रष्ट सरकारी कर्मचारियों, ठेकेदारों (जो मध्यस्थों के रूप में कार्य करते हैं) तथा इन दोनों के संरक्षक भ्रष्ट राजनीतिज्ञों के कुत्सित गठबन्धन की भेंट चढ़ गया है।

नक्सलवाद (Naxalism) रोकने के लिए निवारण

आर्थिक सुधारों तथा उदाहरीकरण की नीतियों के तहत इन समस्त राज्यों में मौजूद विपुल खनिज सम्पदा की खोज एवं निकासी के लिए बहुराष्ट्रीय कम्पनियों तथा भारत की नामी-गिरामी कम्पनियों के साथ समझौते किए गए हैं। इन परियोजनाओं में आदिवासियों को बेदखल तो किया जा रहा है लेकिन उनके पुनर्वास स्थायी तौर पर उनकी आय सृजन क्षमता, रोजगार, रोजी-रोटी, शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं के लिए कुछ भी नहीं किया गया है। उल्टे विकास की अंधी दौड़ में पर्यावरण प्रदूषण की समस्या निरन्तर गम्भीर होती जा रही है। वनस्पतियों और जीव-जन्तुओं की दुर्लभ प्रजातियाँ लुप्तप्राय होती जा रही हैं।

आम आदिवासी इसी बात को लेकर उद्वेलित हैं और सशस्त्र संघर्ष पर ठतारू हैं। इसी प्रकार भारत सरकार तथा राज्य सरकारों को भी अपनी रणनीति पर फिर से विचार करना होगा कि हिंसा के मार्ग पर चल रहे आदिवासी युवाओं को विकास की मुख्यधारा में किस प्रकार से वापस लाया जाए। 30,000 से अधिक नक्सलवादियों को गिरफ्तार करके न तो जेल में डाला जा सकता है और न गोली मारकर उनका समूल विनाश ही किया जा सकता है। नक्सली हिंसा पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए सेना का प्रयोग भी कोई बेहतर विकल्प नहीं है। नक्सलवादी (Naxalite) भारत के शत्रु नहीं हैं, जिनके विरुद्ध सेना कोई निर्णायक युद्ध लड़े, वे आम भारतीय हैं, जो अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं। शांति और सद्भाव का रास्ता दुर्गम हो सकता है, असाध्य नहीं।

➢ उनकी बात सुनी जानी चाहिए।

➢ उनसे हथियार डलवाने के कारगर प्रयास करने चाहिए।

➢ विकास के लिए एकीकृत रणनीति अपनाई जानी चाहिए।

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