भारत-चीन विवाद । India-China dispute

भारत-चीन विवाद । India-China dispute

इस पोस्ट के अन्तर्गत पीएससी/यूपीएससी की मुख्य परीक्षा से संबंधित अति महत्त्वपूर्ण मुद्दों के विषय में चर्चा प्रस्तुत की गई है। इस पोस्ट के अंतर्गत यहाँ पर वही लेख मिलेंगे – जो महत्त्वपूर्ण है एवं तात्कालिक मुद्दों पर आधारित हैं। इन प्रश्नों के माध्यम से न केवल आप किसी चर्चित मुद्दे के संबंध में अपनी समझ को धारदार बना सकते हैं बल्कि परीक्षा के दृष्टिकोण से संबंधित विषय से भी रूबरू हो सकते हैं। किसी भी परीक्षा को क्रैक करने के लिए आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच जरूरी है। योजनाबद्ध तरीके से काम करके ही आप सफलता पा सकते है। यहाँ पीएससी/यूपीएससी की मुख्य परीक्षा की दृस्टि से महत्वपूर्ण मुद्दों पर ही चर्चा प्रस्तुत की जायेगी ताकि आपका समय भी बर्बाद न हो और आप बहुत अच्छी तैयारी कर सके।

भारत-चीन विवाद (India-China dispute)

18वीं सदी में भारत ब्रिटिश उपनिवेश बना था। इसमें आज के भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमार के कुछ हिस्से शामिल थे। 1835 के आसपास ब्रिटेन और रूस दोनों मध्य एशिया में अपना प्रभुत्व जमाने की कोशिश करने लगे। रूस चाहता था कि वह एशिया के दक्षिणी हिस्से में कब्जा जमाए, लेकिन तिब्बत ब्रिटिश भारत और रूस के बीच में आ गया। 20 वीं सदी के शुरूआत में तिब्बत ब्रिटेन का संरक्षित राज्य बन गया। हालांकि 1912 में चीन ने दावा किया कि तिब्बत उसका हिस्सा है, लेकिन 1913 में तिब्बत ने अपनी स्वतंत्रता घोषित कर दी।

भारत-चीन विवाद (India-China dispute) के प्रमुख मुद्दों पर विस्तार से चर्चा करे ?

1914 में शिमला कांफ्रेंस हुई जिसमें ग्रेट ब्रिटेन के अलाव चीन और तिब्बत ने भी हिस्सा लिया। उस समय हेनरी मैकमोहन ब्रिटिश भारत के विदेश मंत्री थे। मैकमोहन ने साफ कर दिया कि ब्रिटेन तिब्बत पर किसी तरह का कब्जा नहीं चाहता है। साथ ही उन्होंने चीन के साथ एक सीमा रेखा तय की। जो आज भी मैकमोहन रेखा के नाम से मशहूर है। चीन ने तभी कह दिया था कि 3000 किलोमीटर लम्बी यह रेखा एक अस्थाई सीमा रेखा होगी, लेकिन भारत ने उसे एक पक्की रेखा माना। चीन ने मैकमोहन लाइन को हमेशा उपनिवेश काल की सीमा रेखा के रूप में देखा।

1947 में जब हिन्दुस्तान आजाद हुआ, तो यह भारत और पाकिस्तान दो देशों में बँट चुका था। नेहरूजी का एक ही नजरिया था कि चीन से दोस्ती रखी जाए। नेहरूजी का मानना था कि दोनों देशों में कई ऐतिहासिक समानताएँ हैं और दोनों ने काफी मुश्किलें देखी हैं। नेहरूजी समझते थे कि इसे ध्यान में रखकर भारत चीन ध्रुव बनाया जा सकता है। इसलिए नारा बना, हिन्दी-चीनी भाई-भाई।

1954 में दोनों देशों ने पंचशील सिद्धांत पर दस्तखत किए, जिसमें शांतिपूर्ण तरीके से साथ – साथ रहने के पाँच सूत्र तय किए गए। चीन ने भारत के सामने प्रस्ताव रखा कि अगर उसे अकसई चीन मिल जाए, तो वह मैकमोहन रेखा को अंतरराष्ट्रीय सीमा मान लेगा। तिब्बत को काबू में करने के दौरान चीन अकसई चीन में काफी अन्दर तक घुस आया था। एक तरह से वहाँ चीन की ही हुकूमत चल रही थी। चीन के लिए आर्थिक तौर पर अकसई चीन ज्यादा महत्व नहीं रखता है और न ही वह भौगोलिक क्षेत्रफल बढ़ाने के लिए यह इलाका हासिल करना चाहता था, लेकिन वह इसके सहारे अपने पश्चिमी हिस्सों तक आसानी से पहुँच सकता था और इस क्षेत्र में पुल बनाकर देश के बुनियादी ढाँचे का विकास करना चाहता था। आखिरकार चाउ एन लाई ने अपना छदम चोला उतार फेंका। उसने कहा कि यह विवादित क्षेत्र तो हमेशा से चीन का अंग रहा है। चाउ एन लाई के धोखे पर पण्डित नेहरू भड़क गए और उन्होंने यह आदेश दे दिया कि चीनी फौज को भारतीय सीमा से खदेड़ दिया जाए।

भारत के सैनिक अधिकारियों ने कई बार चेतावनी दी थी कि उनके पास जंग लड़ने के लिए जरूरी साजो सामान नहीं हैं। अधिकारियों ने यह भी बताया था कि यह इलाका चीन के लिए फायदेमन्द है, क्योंकि भारत को पहाड़ियों के ऊपर चढ़ना पड़ता है और रणनीतिक तौर पर चीन ऊपर है। जिसका उसे फायदा मिलेगा। आखिरकार चीन ने 20 अक्टूबर, 1962 को दो तरफ से भारत पर भयंकर हमला कर दिया। उस समय उसके सैनिकों की संख्या भारत से दस गुना ज्यादा थी। चीनी सेना मौजूदा भारतीय राज्य अरुणाचल प्रदेश और अकसई चीन में बहुत अन्दर तक घुस आई। महीने भर चले युद्ध में भारत के हजारों सैनिक मारे गए। तत्कालीन रक्षामंत्री कृष्ण मेनन ने हमेशा पण्डित नेहरू को चीन की मंशा के बारे में दिग्भ्रमित किया, जिसके कारण भारत अपनी सुरक्षा के पुख्ता और ठोस उपाय नहीं कर सका।

भारत और चीन के बीच विवाद के प्रमुख मुद्दे

● तिब्बत की स्वायत्तता।
● चीन से बहकर आती अन्तरराष्ट्रीय नदियों के जल का उपयोग।
● अक्साई चीन सीमा विवाद।
● मैकमोहन रेखा के दक्षिण भाग पर (अरुणाचल प्रदेश) चीन का अनाधिकृत दावा।
● सिक्किम – चीन सीमा विवाद।

दरअसल, भारत को आशंका नहीं थी कि चीन जैसा मित्र देश उस पर आक्रमण भी कर सकता है। इस घटना को घटे अब 51 वर्ष हो चुके हैं। चीन ने भारत से हड़पी हुई हजारों किलोमीटर जमीन का एक इंच भाग भी वापस नहीं किया। प्रश्न यह है कि क्या हमने 1962 के चीनी आक्रमण से कोई सबक सीखा है ? अब तो चीन के साथ – साथ पाकिस्तान भी हमारा शत्रु है और दोनों दुश्मन मिले हुए हैं। अब खतरा केवल चीन या पाकिस्तान की ओर से ही नहीं, बल्कि चीन और पाकिस्तान की ओर से साझा है।

किसी भी एक देश से युद्ध छिड़ने की स्थिति में भारत को दोनों देशों के साथ जंग की तैयारी करनी होगी। एक बार फिर 1962 जैसे हालात बन रहे हैं। जिस तरह 1962 के युद्ध से पहले चीन भारतीय सीमा का बार-बार उल्लंघन करने लगा था, कमोबेश यही हालात पिछले कुछ समय से फिर पैदा हो रहे हैं। पिछले पाँच वर्षों के दौरान चीन सैकड़ों बार भारतीय सीमा में घुसपैठ कर चुका है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति का तकाजा है कि व्यापार और सांस्कृतिक मामलों में हम चाहे जितने निकटतम मित्र हों, चीन के धूर्ततापूर्ण इतिहास को देखते हुए हमें सतर्क रहना होगा और सुरक्षा के ठोस उपाय करने होंगे।

1962 के युद्ध के बाद से भारत में चीन के प्रति गहरा अविश्वास है। इस अविश्वास को इस बात से और बल मिलता है कि चीन भारत के विकास को रोकना चाहता है। इसका एक उदाहरण सुरक्षा परिषद में स्थाई सीट पाने की भारत की कोशिश है। दरअसल चीन भारत को अपने स्तर का खिलाड़ी नहीं मानता है। वह अमेरिका के साथ एक धरातल पर खेलना चाहता है न कि भारत के साथ। इसलिए चीन को पाकिस्तान की जरूरत है। दक्षिणी चीन सागर में गम्भीर हो रहे क्षेत्रीय विवाद में चीन और भारत आपस में टकरा रहे हैं। मामले की जड़ में संवेदनशील मुद्दा तेल है। चीन लगभग पूरे दक्षिणी चीन सागर पर अपना दावा कर रहा है।

भविष्य में दोनों देशों में विवाद का कारण एक और भी हो सकता है। वह है पानी का विवाद। हिमालय के इलाके की नदियाँ, ब्रह्मपुत्र सहित दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया की कुछ महत्वपूर्ण नदियाँ तिब्बत से निकलती हैं, जिनका पानी भारत के बड़े हिस्से के लिए बहुत जरूरी है। उत्तरी चीन और भारत में सूखे की समस्या को देखते हुए पानी के इस्तेमाल पर नए प्रकार के विवाद की सम्भावना है। आने वाले दिनों में पानी को लेकर विवाद होगा। आबादी के बढ़ने और जलवायु परिवर्तन के कारण संसाधन घट रहे हैं और माँग बढ़ रही है। चीन ने मेकांग, सालवीन और ब्रह्मपुत्र नदियों पर बाँध बनाना शुरू कर दिए हैं। भारत इस बात से चिंतित है कि उसके हिस्से में नदियों में पानी कम हो सकता है। चीन में इस तरह की योजनाएँ हैं कि ब्रह्मपुत्र के पानी को सूखा प्रभावित इलाकों में मोड़ दिया जाए।

वैसे देखा जाए तो भारत-चीन विवाद बहुत व्यापक हैं। भारत चीन के साथ प्रतिस्पर्धा में है। हम हर बात में चीन से तुलना करते हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि चीन हमसे बहुत आगे है। अभी भारत को बहुत कुछ करना है। भारत को एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में चीन के सम्मुख खड़ा होना होगा तभी विवाद के विभिन्न मुद्दों पर भारत का पक्ष मजबूत हो पाएगा तथा भारत की बात सुनी जाएगी और चीन के धमकाने वाले रवैये में परिवर्तन आएगा।

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