मध्यप्रदेश में पंचायती राज । Panchayati Raj in Madhya Pradesh

Panchayati Raj in Madhya Pradesh

यहाँ पर हमने मध्यप्रदेश में पंचायती राज (Panchayati Raj in Madhya Pradesh) के अति महत्वपूर्ण परीक्षा उपयोगी तथ्य दिए है जो कई बार मध्यप्रदेश की विभिन्न परीक्षाओं में पूछें जा चुके है। यदि आप विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे: कांस्टेबल, पुलिस सब-इंस्पेक्टर, संविदा शिक्षक, पी.एस.सी, पटवारी, कृषि विस्तार अधिकारी, प्री एग्रीकल्चर टेस्ट, व्यापमं तथा अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे है तो एक बार आपको इन प्रश्नों को आवश्यक रूप से पढ़ लेना चाहिए। Panchayati Raj के यह महत्वपूर्ण तथ्य आपको किसी भी कॉम्पिटिटिव एग्जॉम को क्रैक करने में मददगार एवं उपयोगी सिद्ध होंगे।

पंचायती राज का उद्देश्य लोगों के संगठनों को वास्तविक शक्तियाँ सौंपकर लोकतंत्र को ग्रामीण स्तर तक ले जाना है। पंचायतीराज का लक्ष्य लोगों को विकास और योजनाओं से जोड़ना है ताकि अफसर शाही पर निर्भरता को कम किया जा सके। अनुच्छेद 40 के अनुसार संवैधानिक व्यवस्थाओं को आकार प्रदान करने के लिए, 1956 में बलवन्त राय मेहता समिति ने ग्रामीण स्तर पर सबल लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रवर्तन को प्रोत्साहित करने हेतु शक्तियों के लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण की सिफारिश की थी। इस समिति ने 1957 में सौंपी अपनी रिपोर्ट में क्षेत्रीय स्वायत्त शासन की त्रि – स्तरीय संरचना की सिफारिश की थी, जो अग्र प्रकार है –
(अ) ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायत,
(ब) ब्लॉकस्तर पर पंचायत समिति, जिसके सदस्य ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले गांवों की पंचायतों द्वारा निर्वाचित किए गए हों,
(स) जिला स्तर पर जिला परिषदें।

मध्यप्रदेश में पंचायती राज (Panchayati Raj in Madhya Pradesh)

1907 में दतिया नगरपालिका का गठन किया गया था।

➢ ग्रामीण विकास के लिए 2 अक्टूबर 1952 को सामुदायिक विकास कार्यक्रम चलाया गया था।

➢ भारतीय संविधान के अनुच्छेद 40 में पंचायतों के गठन का प्रावधान है।

1956 में बलवंतराय मेहता समिति का गठन किया गया जिसने अपनी रिपोर्ट 1957 में त्रिस्तरीय पंचायती राज के गठन का सुझाव दिया।
(i) ग्राम पंचायत
(ii) पंचायत समिति
(iii) जिला परिषद्

➢ बलवंतराय मेहता समिति के सुझाव को राष्ट्रीय विकास परिषद् ने स्वीकार किया और उसके बाद सभी राज्यों में त्रिस्तरीय पंचायती राज प्रणाली अपनाई।

➢ त्रिस्तरीय पंचायती राज को अमलीजामा पं. जवाहरलाल नेहरू ने 2 अक्टूबर, 1959 को नागौर (राजस्थान) में पहनाया।

➢ इस प्रकार राजस्थान पहला राज्य था, जिसने पंचायती राज की शुरुआत की। इसके बाद आंध्रप्रदेश ने 1959 से ही पंचायती राज की शुरुआत की।

➢ मध्यप्रदेश गठन के पूर्व महाकौशल, मध्यभारत, विंध्यप्रदेश, भोपाल तथा सिरोंज में अलग – अलग पंचायती राज व्यवस्था लागू थी।

➢ महाकौशल में पंचायती राज व्यवस्था “सेन्ट्रल प्राविन्सेस एवं बरार पंचायती राज अधिनियम 1946” के अनुसार थी। इसमें प्रावधान था कि ग्राम पंचायतों का प्रथम गठन पंचों के मनोनय द्वारा हो, न कि निर्वाचन द्वारा।

➢ 1948 के अधिनियम के तहत महाकौशल में हर तहसील में जनपद सभाओं की स्थापना की गई। इस प्रकार महाकौशल क्षेत्र में तहसील स्तर पर जनपद सभाएँ, ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायतें, न्याय स्तर पर न्याय पंचायतें, आदिम जाति बाहुल्य क्षेत्र में आदिम जाति पंचायतें एवं जिला स्तर पर परगना पंचायतों की व्यवस्था की गई थी।

➢ मध्यभारत में 1929 से इन्दौर, ग्वालियर एवं नरसिंहगढ़ में पंचायतें स्थापित की गई थीं।

➢ ग्वालियर रियासत में ग्राम पंचायतें, परगना बोर्ड तथा जिला बोर्ड की अत्यन्त सुगठित व्यवस्था थी।

➢ मध्यभारत राज्य की स्थापना 28 मई, 1948 को की गई थी। ग्वालियर, इन्दौर तथा मालवा संयुक्त प्रान्त को मिलाकर मध्यभारत राज्य की स्थापना की गई थी।

➢ मध्यभारत में जिला स्तर पर मंडल पंचायतों, खण्ड स्तर पर केन्द्र पंचायतों तथा ग्राम स्तर पर ग्राम पंचायतों की स्थापना की गई थी।

➢ 1948 में विध्यप्रदेश के अस्तित्व में आने के बाद 1949 में ग्राम पंचायत अध्यादेश द्वारा ग्राम पंचायतों के गठन का प्रावधान किया गया।

1962 में सर्वप्रथम पंचायत अधिनियम बना था।

➢ 73वाँ संविधान संशोधन 1992 में लागू हुआ।

➢ म.प्र. में 30 दिसम्बर 1993 को म.प्र. पंचायती राज अधिनियम 1993 रखा गया।

25 जनवरी 1994 को म.प्र. में लागू हुआ।

➢ म.प्र. में 25 जनवरी को प्रतिवर्ष मतदाता दिवस मनाया जाता है।

➢ विधिवत पंचायती राज प्रारम्भ करने वाला देश का प्रथम राज्य म.प्र. 1994 है।

➢ राज्य निर्वाचन आयोग के प्रथम अध्यक्ष श्री एम. वी. लोहानी थे।

➢ म.प्र. देश का पहला राज्य है जिसने ग्राम स्वराज की स्थापना 26 जनवरी 2001 में की।

➢ पंचायत राज में 29 विषय सम्मिलित हैं।

➢ जिस खण्ड या क्षेत्र में अनुसूचित जाति व जनजाति की जनसंख्या 50% से कम है वहाँ 25% सरपंच पद अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए होगा।

➢ जिस जिले में अनुसूचित जाति – जनजाति की जनसंख्या 50% से कम है वहाँ 25% जनपद अध्यक्षों के पद अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षित होंगे।

➢ राज्य में 20% स्थान जिला पंचायत अध्यक्षों के पद अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित होंगे।

➢ जिस पंचायत में प्रमुख अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या पिछड़ा वर्ग का नहीं होगा, तो वहाँ का उपप्रमुख इन्हीं वगों में से निर्वाचित किया जाएगा।

➢ वर्ष 2006-07 से पंचायतों में महिलाओं को 50% आरक्षण दिया गया। इसके पहले 33% आरक्षण था।

➢ प्रदेश में नई संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत त्रि – स्तरीय पंचायतों का चुनाव करवाने वाला मध्यप्रदेश पहला राज्य बन गया।

➢ पंचायतों को दलीय भावना और दलीय दोष से दूर रखने के लिए पंचायत चुनाव दलीय आधार पर नहीं होते हैं।

➢ Right To Recall का प्रथम प्रयोग जिले अनूपपुर तहसील की पल्लविका पटेल को इसी अधिकार द्वारा जनता द्वारा हटाया गया था।

2 फरवरी 2006 से मनरेगा योजना म.प्र. में लागू।

मनरेगामहात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना नाम है।

➢ ग्राम सभा बैठक प्रतिमाह ग्राम सभा की सुविधानुसार सम्पन्न होती है। बैठक के लिए न्यूनतम कोरम 20% होना अनिवार्य है। कोरम में एक तिहाई महिला एवं SC, ST के सदस्यों का उपस्थित होना आवश्यक माना गया है।

➢ Right to Recall के माध्यम से वापस बुलाने का अधिकार दिया गया जो निर्वाचित होने के दो वर्ष बाद ही 2/3 बहुमत से सम्भव होता है।

ग्राम पंचायत (Village Panchayat)

ग्राम पंचायत, पंचायती राज प्रणाली का पहला स्तर (टीयर) है। ग्राम सभा पंचायत की सार्वजनिक संस्था है। यहाँ सभापति को सरपंच कहा जाता है। ग्रामसभा के सदस्यों द्वारा गुप्त मतदान करके ही सभी सदस्यों का चुनाव होता है।

➢ एक हजार से अधिक एवं 5000 से कम आबादी तक एक ग्राम पंचायत होगी।

➢ जनसंख्या के अनुपात में 10 से 20 वार्डों का गठन किया जायेगा। सभी वार्डों की जनसंख्या सामान्यत: बराबर रहेगी।

➢ ग्राम पंचायत प्रशासनिक अधिकारी ग्राम सचिव एवं राजनीतिक प्रमुख सरपंच होता है।

➢ ग्राम पंचायत में सरपंच का चुनाव प्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली के माध्यम से होता है।

➢ ग्राम पंचायत में उपसरपंच का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित पंचों में से उपसरंपच का चुनाव अप्रत्यक्ष निर्वाचन से होता है।

➢ ग्राम पंचायत का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है।

26 जनवरी 2001 से ग्राम स्वराज्य योजना लागू की गई है।

➢ वर्तमान में 23006 ग्राम पंचायतें हैं।

➢ म.प्र. पहला राज्य है जिनसे स्थानीय निकायों में Right to Recall का प्रावधान किया।

जनपद पंचायत (Janpad Panchayat)

त्रिस्तरीय संरचना की मध्य वाली कड़ी। इसे जनपद पंचायत, तालुका पंचायत और अंचल पंचायत आदि भी कहा जाता है। इसमें शामिल हैं-
(1) पंचायतों के सरपंच (पदेन),
(2) स्थानीय सांसद, विधायक और विधानपरिषद् के सदस्य (मताधिकार सहित या मताधिकार रहित),
(3) नारी प्रतिनिधि, अनुसूचित जातियाँ और अनुसूचित जनजातियाँ जो सहयोजित हैं और जिनकी सदस्यता आरक्षित हैं, और
(4) नगर पालिकाओं और सरकारी समितियों आदि का प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्ति। इसका अध्यक्ष पंचायत समिति के सदस्यों में से चुना जाता है।

➢ प्रदेश में वर्तमान में 313 जनपद पंचायतें हैं।

➢ क्षेत्र के विधायक एवं सासंद पदेन सदस्य होते हैं।

➢ यह मध्य स्तर है जिसका गठन विकासखण्ड स्तर पर होता है।

➢ 5000 से 50,000 तक आबादी पर जनपद पंचायत होगी।

➢ जनपद पंचायत में 10 – 25 वार्ड होते हैं।

➢ सदस्यों का चुनाव प्रत्यक्ष रीति से किया जाता है।

➢ जनपद अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष का चुनाव अप्रत्यक्ष रीति से चुने हुए जनपद सदस्यों के द्वारा सदस्यों में से ही किया जाता है।

➢ जनपद पंचायत का प्रशासनिक प्रमुख मुख्य कार्यपालन अधिकारी होता है।

➢ जनपद पंचायत का राजनैतिक प्रमुख जनपद अध्यक्ष होता है।

जिला पंचायत (District Panchayat)

पंचायती राज प्रणाली का सबसे ऊपरी स्तर (टीयर) जिला परिषद् कहा जाता है। यह निचले स्तर पर ग्रामीण स्थानीय सरकारी निकायों के बीच एक कड़ी का काम करती है, जैसे पंचायत समिति और राज्य विधानमण्डल और संसद। इसमें पंचायत समितियों के प्रतिनिधि, विधानसभा के स्थानीय सदस्य, जिला या उसके किसी भाग का प्रतिनिधित्व करने वाले संसद सदस्य, अनुसूचित जाति – जनजाति व महिलाओं आदि के प्रतिनिधि, सहकारी संस्थाओं के प्रतिनिधि आदि होते हैं तथा इसके सदस्यों में से ही इसके सभापति का चुनाव होता है। जिला परिषद् का कार्यकाल 5 वर्ष है।

➢ उच्च स्तर पर जिला पंचायत होती है।

➢ 50,000 जनसंख्या से ऊपर आबादी वाले क्षेत्रों में गठन किया जाता है।

➢ जिला पंचायत सदस्यों की संख्या 10 से 35 होती है। जिसका चुनाव प्रत्यक्ष रीति से किया जाता है।

➢ सांसद, विधायक, कलेक्टर, जनपद अध्यक्ष पदेन सदस्य होते हैं।

➢ अध्यक्ष, उपाध्यक्ष के पद अप्रत्यक्ष निर्वाचन रीति को अपनाया जाता है।

➢ जिला पंचायत का प्रशासनिक प्रमुख मुख्य कार्यपालन अधिकारी एवं राजनैतिक प्रमुख जिला पंचायत अध्यक्ष होता है।

➢ सभी निर्वाचक क्षेत्रों की जनसंख्या सामान्य तथा एक सी होती है।

➢ जिला पंचायत का कार्यकाल 5 वर्ष होता है।

19 जनवरी 1994 को मध्यप्रदेश राज्य निर्वाचन आयोग का गठन किया गया है।

➢ इसके साथ SC, ST एवं OBC के लिए भी आरक्षण व्यवस्था है।

➢ सहकारी बैंकों के अध्यक्ष सहयोजित सदस्य होते हैं।

➢ 73वाँ संविधान संशोधन लागू करने वाला 1993 के अन्तर्गत म.प्र. प्रथम राज्य था।

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